
दिल्ली की राजनीति में अक्सर आरोपों की आतिशबाज़ी होती है. लेकिन इस बार चिंगारी सीधे कोर्टरूम की चौखट तक पहुंच गई है.
एक्साइज पॉलिसी केस में आम आदमी पार्टी के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है.
केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री Manish Sisodia समेत अन्य आरोपियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मांग की है कि केस को Justice Swarnkanta Sharma की पीठ से हटाकर किसी दूसरी ‘निष्पक्ष’ बेंच को सौंपा जाए.
राजनीति की भाषा में यह एक बयान है. लेकिन न्यायपालिका की दुनिया में यह एक बड़ा सवाल बन जाता है.
विवाद की चिंगारी: एक नोटिस और उठे सवाल
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब 9 मार्च को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की एकल पीठ ने सीबीआई की याचिका पर सुनवाई करते हुए केजरीवाल समेत 22 आरोपियों को नोटिस जारी किया.
साथ ही निचली अदालत के उस फैसले पर भी रोक लगा दी गई जिसमें सीबीआई जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई थी.
बस यहीं से अदालत की कार्यवाही के साथ राजनीति की बहस भी शुरू हो गई.
AAP का कहना है कि उन्हें आशंका है कि केस की सुनवाई पूरी तरह निष्पक्ष और तटस्थ माहौल में नहीं हो पाएगी. यानी कोर्ट के बाहर बयानबाज़ी और कोर्ट के अंदर कानूनी दांव-पेंच अब साथ-साथ चल रहे हैं.
सिसोदिया की सुप्रीम कोर्ट दौड़
इस बीच मामला और दिलचस्प मोड़ ले चुका है. पूर्व उपमुख्यमंत्री Manish Sisodia ने हाईकोर्ट के समन को चुनौती देते हुए सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है.
राजनीतिक विश्लेषक रूबी अरुण का कहना है कि यह कदम सिर्फ कानूनी रणनीति नहीं बल्कि पब्लिक नैरेटिव की लड़ाई भी है. क्योंकि आज अदालत की हर सुनवाई सिर्फ कोर्टरूम में नहीं होती, बल्कि टीवी डिबेट और सोशल मीडिया पर भी होती है.
कौन हैं जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा
इस विवाद के बीच जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का नाम अचानक सुर्खियों के केंद्र में आ गया है. डॉ. स्वर्णकांता शर्मा का शैक्षणिक और न्यायिक सफर काफी प्रभावशाली माना जाता है.
उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में बीए ऑनर्स किया और सर्वश्रेष्ठ सर्वांगीण छात्रा का सम्मान प्राप्त किया.

कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एलएलएम और बाद में न्यायिक शिक्षा पर शोध करते हुए पीएचडी हासिल की.
न्यायिक सेवा में उनका करियर भी तेज़ रहा. सिर्फ 24 वर्ष की उम्र में मजिस्ट्रेट बनना और 35 साल की उम्र में सत्र न्यायाधीश बन जाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है.
उन्होंने परिवार न्यायालय, सीबीआई कोर्ट और महिलाओं से जुड़े अपराधों के विशेष अदालतों में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं.
कानूनी नजरिया: क्या जज बदलना आसान है?
कानूनी विशेषज्ञ अमित तिवारी कहते हैं, “भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी जज की पीठ से मामला हटाने की मांग असाधारण स्थिति में ही की जाती है. इसके लिए ठोस आधार होना जरूरी होता है, सिर्फ आशंका पर्याप्त नहीं मानी जाती.”
उनके मुताबिक अदालतें इस तरह की मांगों को बेहद सावधानी से देखती हैं क्योंकि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता जुड़ी होती है.
अदालत से बाहर की राजनीति
इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्या यह सिर्फ कानूनी प्रक्रिया है या फिर अदालत के भीतर चल रही सुनवाई के समानांतर राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई भी?
दिल्ली की राजनीति में एक्साइज पॉलिसी केस पहले ही एक बड़ा मुद्दा बन चुका है. अब जज को लेकर उठे सवालों ने इसे और भी संवेदनशील बना दिया है.
आने वाले दिनों में अदालत क्या फैसला लेती है, यह अलग बात है. लेकिन फिलहाल दिल्ली की राजनीति और न्यायपालिका के बीच यह टकराव राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है.
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